वापसी
मुझे पता है आप सभी नाराज होंगे मुझसे। वादा करके भी कुछ लिख ना पाया छुट्टियों के बाद क समां। बहुत ही ज्यादा व्यस्तता हो गयी थी।
अब पीछे लौट कर फिर से वो सब लिखना, विस्तार में, जमेगा नहीं। ईसलिए संक्षेप मे लिखना कर आगे बढता हुँ।
तो, छुट्टियों मे जब घर जा रहे थे हम सभी तो उत्साहित थे बहुत ही। पर कितनी लम्बी होती हैं छः दिनों की छुट्टियाँ!! समय तो बस पंख लगा कर उड़ना जानता है। जब आपको सबसे अधिक आवश्यक्ता होती है आपको उसकी तभी दगा दे जाता है। साढ़े तीन घंटे की हवाई यात्रा और फिर 4 घण्टे की रेल यात्रा करके घर पहुंचा, सोचा.. दुनिया कितनी छोटी हो गयी है! पटना से निकल कर दाउदनगर (औरंगाबाद जिला, बिहार में जहाँ मेरा पैतृक घर है) पहुंचने में इससे अधिक समय लग जाते थें मेरे पिताजी को, जब वो पटना में ईंजीनियरिंग डिप्लोमा कर रहे थे। बढ़िया है। समय बहुत बदल गया है। मुद्रास्फीति की बढ़ने की दर उतनी भी अधिक नहीं है जितना कि लोग हल्ला मचाते हैं, है ना! आह! बहुत विस्तृत ब्यौरा लिखे जा रहा हुँ। अब सम्भलता हुँ।माँ, पिताजी, बहन-भाई, दोस्तों से मिलने में, माँ के हाथों का बना खाना खाने, सोने, टीवी देखने, मस्ती ईत्यादि करने में दिन कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। फिर से वही कॉलेज। रोज रात.. नहीं नहीं.. सुबह 4-5 बजे सोना, 9 बजे क्लास मे पहुँचना, 2:30 बजे क्विज (surprise exams), मेस या “café TANSTAAFL” मे देर-सवेर खाना खाना.. सभी पुरानी दिनचर्या। खैर यही जिन्दगी है। (सुना था परिवर्तन जिन्दगी का दुसरा नाम है, पर यहाँ तो जिन्दगी में नीरसता और एकरुपता (Monotonous) ही है। )
वापस आया, registration किया, अगले दिन से पढ़ाई जारी... समय ही नही मिला चिठ्ठा लिखने का। (अब आप मुझसे नाराज़ नहीं होंगे बल्कि मुझ पर दया आ रही होगी आपको, है ना।) ,’-)
पर क्या सचमुच यहाँ की लाईफ मोनोटोनस है? नवरात्रि आ रही है, (भूतकाल में लिख रहा हुँ), देखतें हैं.. आप भी किजिये इंतज़ार। अहमदाबाद की नवरात्री।अभी के लिये इतना ही, सुबह होने वाली है, विदा लेता हुँ।नमस्कार
अब पीछे लौट कर फिर से वो सब लिखना, विस्तार में, जमेगा नहीं। ईसलिए संक्षेप मे लिखना कर आगे बढता हुँ।
तो, छुट्टियों मे जब घर जा रहे थे हम सभी तो उत्साहित थे बहुत ही। पर कितनी लम्बी होती हैं छः दिनों की छुट्टियाँ!! समय तो बस पंख लगा कर उड़ना जानता है। जब आपको सबसे अधिक आवश्यक्ता होती है आपको उसकी तभी दगा दे जाता है। साढ़े तीन घंटे की हवाई यात्रा और फिर 4 घण्टे की रेल यात्रा करके घर पहुंचा, सोचा.. दुनिया कितनी छोटी हो गयी है! पटना से निकल कर दाउदनगर (औरंगाबाद जिला, बिहार में जहाँ मेरा पैतृक घर है) पहुंचने में इससे अधिक समय लग जाते थें मेरे पिताजी को, जब वो पटना में ईंजीनियरिंग डिप्लोमा कर रहे थे। बढ़िया है। समय बहुत बदल गया है। मुद्रास्फीति की बढ़ने की दर उतनी भी अधिक नहीं है जितना कि लोग हल्ला मचाते हैं, है ना! आह! बहुत विस्तृत ब्यौरा लिखे जा रहा हुँ। अब सम्भलता हुँ।माँ, पिताजी, बहन-भाई, दोस्तों से मिलने में, माँ के हाथों का बना खाना खाने, सोने, टीवी देखने, मस्ती ईत्यादि करने में दिन कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। फिर से वही कॉलेज। रोज रात.. नहीं नहीं.. सुबह 4-5 बजे सोना, 9 बजे क्लास मे पहुँचना, 2:30 बजे क्विज (surprise exams), मेस या “café TANSTAAFL” मे देर-सवेर खाना खाना.. सभी पुरानी दिनचर्या। खैर यही जिन्दगी है। (सुना था परिवर्तन जिन्दगी का दुसरा नाम है, पर यहाँ तो जिन्दगी में नीरसता और एकरुपता (Monotonous) ही है। )
वापस आया, registration किया, अगले दिन से पढ़ाई जारी... समय ही नही मिला चिठ्ठा लिखने का। (अब आप मुझसे नाराज़ नहीं होंगे बल्कि मुझ पर दया आ रही होगी आपको, है ना।) ,’-)
पर क्या सचमुच यहाँ की लाईफ मोनोटोनस है? नवरात्रि आ रही है, (भूतकाल में लिख रहा हुँ), देखतें हैं.. आप भी किजिये इंतज़ार। अहमदाबाद की नवरात्री।अभी के लिये इतना ही, सुबह होने वाली है, विदा लेता हुँ।नमस्कार

