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Wednesday, October 12, 2005

वापसी

मुझे पता है आप सभी नाराज होंगे मुझसे। वादा करके भी कुछ लिख ना पाया छुट्टियों के बाद क समां। बहुत ही ज्यादा व्यस्तता हो गयी थी।
अब पीछे लौट कर फिर से वो सब लिखना, विस्तार में, जमेगा नहीं। ईसलिए संक्षेप मे लिखना कर आगे बढता हुँ।
तो, छुट्टियों मे जब घर जा रहे थे हम सभी तो उत्साहित थे बहुत ही। पर कितनी लम्बी होती हैं छः दिनों की छुट्टियाँ!! समय तो बस पंख लगा कर उड़ना जानता है। जब आपको सबसे अधिक आवश्यक्ता होती है आपको उसकी तभी दगा दे जाता है। साढ़े तीन घंटे की हवाई यात्रा और फिर 4 घण्टे की रेल यात्रा करके घर पहुंचा, सोचा.. दुनिया कितनी छोटी हो गयी है! पटना से निकल कर दाउदनगर (औरंगाबाद जिला, बिहार में जहाँ मेरा पैतृक घर है) पहुंचने में इससे अधिक समय लग जाते थें मेरे पिताजी को, जब वो पटना में ईंजीनियरिंग डिप्लोमा कर रहे थे। बढ़िया है। समय बहुत बदल गया है। मुद्रास्फीति की बढ़ने की दर उतनी भी अधिक नहीं है जितना कि लोग हल्ला मचाते हैं, है ना! आह! बहुत विस्तृत ब्यौरा लिखे जा रहा हुँ। अब सम्भलता हुँ।माँ, पिताजी, बहन-भाई, दोस्तों से मिलने में, माँ के हाथों का बना खाना खाने, सोने, टीवी देखने, मस्ती ईत्यादि करने में दिन कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। फिर से वही कॉलेज। रोज रात.. नहीं नहीं.. सुबह 4-5 बजे सोना, 9 बजे क्लास मे पहुँचना, 2:30 बजे क्विज (surprise exams), मेस या “café TANSTAAFL” मे देर-सवेर खाना खाना.. सभी पुरानी दिनचर्या। खैर यही जिन्दगी है। (सुना था परिवर्तन जिन्दगी का दुसरा नाम है, पर यहाँ तो जिन्दगी में नीरसता और एकरुपता (Monotonous) ही है। )
वापस आया, registration किया, अगले दिन से पढ़ाई जारी... समय ही नही मिला चिठ्ठा लिखने का। (अब आप मुझसे नाराज़ नहीं होंगे बल्कि मुझ पर दया आ रही होगी आपको, है ना।) ,-)
पर क्या सचमुच यहाँ की लाईफ मोनोटोनस है? नवरात्रि आ रही है, (भूतकाल में लिख रहा हुँ), देखतें हैं.. आप भी किजिये इंतज़ार। अहमदाबाद की नवरात्री।अभी के लिये इतना ही, सुबह होने वाली है, विदा लेता हुँ।नमस्कार

 

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Thursday, September 15, 2005

एक सत्र की समाप्ति

परीक्षाओं के खत्म होने का आनन्द ही अलग होता है। और भारतीय प्रबन्ध संस्थान में तो कहने ही क्या। आखिरी पर्चे का समय आया नहीं कि खुशियों का महौल हो जाता है हर ओर। घर जाने का समय जो पास आ चुका होता है।आज कमोबेश ऎसा हीं समां बंधा हुआ था हर तरफ। दिल्ली जाने वाले समय पर रेलगाडी पकड सकें इसके लिए छात्रों नें कार्यालय में कह कर पहले ही आखिरी पर्चे का समय आधे घण्टे पीछे करवा लिया था। बस फिर देर किस बात कि थी? कुछ लोग तो एक-डेढ घण्टे पहले ही परीक्षा भवन से बाहर निकल चुके थें।घर जाने की जो जल्दी थी! वो भी पहली बार, इस कैद से निकलने का यह पहला मौका जो था, भला कैसे जाने देते हाथ से? कुछ लोग तो इस कदर खुश थें की परीक्षा भवन से बाहर निकलते ही चिल्लाने लगे: फ़च्चों* का टेम्पो हाई है, बाकी सब की ले ली, जिग-जैग-जिग-जैग।
[* फ़च्चे: प्रथम वर्ष के छात्र]
आप में से कुछ लोग सोंच रहे होंगे कि ये इन छुट्टियों को इतना बढा चढा कर क्युं बता रहा है! पर जरा सोचिये कि जो बच्चे अब तक बिल्कुल खुली हवा में सांस ले रहे हों उन्हें अचानक से जेल में डाल दिया जाये तो उन्हें कैसा लगेगा? और उस जेल से बाहर निकलने का आनन्द तो समझा ही जा सकता है।

और अब समां ये है कि.. कोई भी नही है परिसर मे, टुच्चे हैं, पर फिर भी अजीब सी खामोशी छाई हुई है यहाँ पर अजीब सा सन्नाटा छाया हुअ है हर तरफ। अचानक से ऎसा लगने लगा है मानो हम सब लोगों को इस जेल की जिन्दगी की आदत सी हो चुकी है।
ऎसा कैसे कह रहा हुँ मैं? ठीक है, चलिये बता ही देता हुँ। हुआ युँ कि अचानक मेरे जाने के कार्यक्रम मे कुछ बदलाव आ गया और मैं बदकिस्मत एक और दिन ठहर गया हुँ यहाँ पर। और मैं ऎसा महसुस कर रहा हुँ जैसे मेरा सब कुछ लुट चुका है। कोई नहीं है यहाँ, मेरे चारों तरफ.. मेरे दुःख सुख बाँटने वाला। वैसे मुझे पता है कि कल यहाँ से जाने के बाद मै कुछ दिनों तक ये सब याद नहीं करने वाला। ये सब मतलब.. यहाँ की वो 24x7 की व्यस्तता, वो हजार असाईनमेंट्स, वो रेम सेशंस और वो मानसिक और शारीरिक तनाव। सब भूल कर कुछ दिन चैन की जिन्दगी जीने वाला हुँ। ये सब मित्र तो रहेंगे ही, सुख-दुःख मे एक दुसरे का साथ देने के लिये।
एक बटा छः मैनेजर तो बन ही चुके हैं हम सब। भगवान भला करे। कल रात या युँ कह लें कि परसों सुबह निकल रहा हुँ मैं, इस आशा के साथ कि एक चित्रमय वेब-दैनिकी आप के समक्ष रख सकुंगा।
बहुत रात हो चुकी है, आज बहुत दिनों (महीनों!!) के बाद चैन की नींद सोने वाला हुँ।शुभरात्रि              

 

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Wednesday, September 14, 2005

मेरी पहली वेब-दैनिकी

आप सब हिन्दी प्रेमियों को मेरा नमस्कार

ब्लॉगिंग के मेरे दिन अच्छे खासे चल रहे थें लेकिन सब के सब अंग्रेजी में।
अचानक दो दिन पहले हिन्दी का एक ब्लॉग (वेबदैनिकी) देखा और तुरंत ही कुछ हिन्दी में लिखने की इच्छा जागृत हो उठी। कहने को तो मेरी परीक्षायें चल रही थीं पर फिर भी मैने थोडा अनुसंधान किया और जल्द ही हिन्दी में लिखने (टंकण करने) में माहिर हो गया। आज परीक्षायें खत्म हो चुकी हैं पर साथ ही घर जाने का समय आ गया है (वर्तमान में मैं "भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद" से व्यवसाय में पदव्योत्तर कर रहा हुँ और संस्थान के छात्रावास में रह रहा हूँ। ) पर फिर भी जाने के पहले एक बार लिख लेने का लोभ संवरण नही कर पाया।
तो यहाँ हूँ मैं, आपके समक्ष, अपना पहला हिन्दी ब्लॉग लिखता हुआ। साथ ही मैं आप सबों से, जिन्होने कि यह ब्लॉग खोला है, क्षमा चाहूँगा कि परिस्थिति वश ज्यादा लिख नहीं सकता अभी, पर साथ ही यह विश्वास भी दिलाता हूँ कि जल्द ही, घर से वापस आने के बाद इसकी शुरूआत कर दूंगा।
मेरी शुभकामनायें आप सबों के साथ हैं। साथ ही संस्थान के मेरे मित्रों को भी मेरी शुभकामनायें, आप सबों की यात्रा सुखमय हो ऐसी कामना करते हुये अब अलविदा कहता हूँ।

आशा है मैं एक बार फिर से आपके समक्ष होऊंगा अपने वेबदैनिकी के रुप में।
अलविदा और नमस्कार

आपका अपना
कुमार मानवेन्द्र
छात्र, प्रथम वर्ष
भारतीय प्रबंध संस्थान
अहमदाबाद          

 

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